पितृ पक्ष में श्राद्ध तिथि कैसे चुनें, क्या करें जब तिथि न हो मालूम?
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Published - 09 September 2025 173 views
हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व बताया गया है. इस दौरान अपने पूर्वजों और पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करके उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है. पंचांग के अनुसार, इस साल पितृ पक्ष की शुरुआत 7 सितंबर 2025 से हो चुकी है और यह 21 सितंबर 2025 तक चलेगा. मान्यता है कि श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं और घर-परिवार पर आशीर्वाद बरसाते हैं. लेकिन कई बार आपने लोगों से सुना होगा कि अगर पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद न हो तो क्या किया जाए?
श्राद्ध की तिथि का निर्धारण कैसे होता है?
श्राद्ध की तिथि का निर्धारण उस तिथि के आधार पर होता है, जिस दिन किसी परिजन का निधन हुआ हो. यानी, अगर आपके दादाजी का निधन पंचमी तिथि को हुआ था, तो पितृ पक्ष में पंचमी तिथि के दिन ही उनका श्राद्ध करना सबसे शुभ माना जाता है. यह तिथि पंचांग के अनुसार निर्धारित होती है.
निधन की तिथि के अनुसार: अपने पूर्वज की मृत्यु की तिथि न कि तारीख के अनुसार ही श्राद्ध करें. उदाहरण के लिए, अगर किसी का निधन भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हुआ था, तो पितृ पक्ष में चतुर्थी को उनका श्राद्ध किया जाएगा.
तिथि और वार का महत्व: श्राद्ध हमेशा तिथि के आधार पर होता है, दिन (वार) के आधार पर नहीं.
विभिन्न प्रकार की मृत्यु के लिए विशेष तिथियां:
.दुर्घटना में मृत्यु: जिन लोगों की मृत्यु किसी दुर्घटना, शस्त्र, या जल में डूबने से हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को करना चाहिए.
.अकाल मृत्यु: जिन लोगों की मृत्यु अचानक या अकाल में हुई हो, उनका श्राद्ध भी चतुर्दशी को कर सकते हैं.
.साधु-संतों का श्राद्ध: संन्यासियों और साधु-संतों का श्राद्ध द्वादशी तिथि को करने का विधान है.
.महिलाओं का श्राद्ध: सुहागिन महिलाओं का निधन हो जाए तो उनका श्राद्ध नवमी तिथि को किया जाता है. इस तिथि को ‘अविधवा नवमी’ भी कहते हैं.
जब श्राद्ध की तिथि न मालूम हो तो क्या करें?
कई बार ऐसा होता है कि हमें अपने किसी पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि याद नहीं होती. ऐसे में, आप ‘सर्व पितृ अमावस्या’ के दिन श्राद्ध कर सकते हैं.
सर्व पितृ अमावस्या क्या है?
पितृ पक्ष की आखिरी तिथि, यानी अमावस्या को सर्व पितृ अमावस्या कहते हैं. यह दिन उन सभी पूर्वजों के लिए समर्पित है जिनकी मृत्यु की तिथि अज्ञात है. इस दिन श्राद्ध कर्म करने से सभी अज्ञात पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. यह एक तरह से एक ‘सार्वभौमिक श्राद्ध दिवस’ है, जहां आप सभी दिवंगत आत्माओं का तर्पण कर सकते हैं. अगर आप अपने सभी पितरों का एक साथ श्राद्ध करना चाहते हैं, तो भी यह दिन सबसे उत्तम होता है.
श्राद्ध के कुछ महत्वपूर्ण नियम
श्राद्ध हमेशा दोपहर के समय (कुतुप या रोहिणी मुहूर्त में) करना चाहिए.
श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन कराना और दान देना बहुत महत्वपूर्ण है.
श्राद्ध कर्म के दौरान पितरों को याद करते हुए, उन्हें तिल, जल और कुश अर्पित करें.
पितृ पक्ष में कोई भी शुभ या नया काम करने से बचें.
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